बुनियादी सुविधाएं ‘रिचार्ज आधारित उत्पाद’ नहीं हो सकतीं

जब हम बिजली जैसी सेवा को समकालीन जीवन के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अब केवल उपभोग की वस्तु या एक सामान्य सुविधा नहीं रह गई है, बल्कि यह मनुष्य के अस्तित्व, गरिमा और सामाजिक भागीदारी का आधार बन चुकी है। आज का जीवन—चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य सेवाएँ हों, डिजिटल संचार हो, न्यायिक प्रक्रियाएँ हों या आजीविका के साधन—सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बिजली पर निर्भर हैं।

ऐसी स्थिति में बिजली की उपलब्धता को बाजार की वस्तु मानना और उसे पूरी तरह भुगतान-आधारित अनुशासन में बाँध देना, अपने आप में एक गंभीर वैचारिक प्रश्न खड़ा करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या यह स्पष्ट कर चुकी है कि “जीवन” का अर्थ केवल सांस लेना नहीं, बल्कि गरिमामय, सुरक्षित और संतुलित जीवन जीना है।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में यह स्थापित किया है कि राज्य का दायित्व केवल हस्तक्षेप से बचना नहीं, बल्कि ऐसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है जो जीवन की गुणवत्ता को परिभाषित करती हैं। Municipal Council, Ratlam v. Vardhichand और Chameli Singh v. State of U.P. जैसे निर्णय इस व्यापक दृष्टिकोण को पुष्ट करते हैं, जहाँ न्यायालय ने यह संकेत दिया कि यदि राज्य आवश्यक सुविधाओं के प्रावधान में विफल रहता है, तो यह अनुच्छेद 21 की भावना के प्रतिकूल है।

इस प्रकार, भले ही “बिजली” शब्द हर निर्णय में प्रत्यक्ष रूप से उल्लिखित न हो, परंतु उसकी अनिवार्यता और जीवन से उसका अभिन्न संबंध न्यायिक दृष्टि में निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका है।

इसी संदर्भ में जब हम विद्युत अधिनियम, 2003 की ओर देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि विधायिका ने भी उपभोक्ता की स्वतंत्रता और सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित ढांचा तैयार किया था। विशेष रूप से धारा 47(5) में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि प्रीपेड मीटर कोई बाध्यता नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ता के लिए एक विकल्प मात्र है—अर्थात् उपभोक्ता अपनी आर्थिक स्थिति, आय की नियमितता और व्यक्तिगत सुविधा के आधार पर यह निर्णय ले सकता है कि वह अग्रिम भुगतान की व्यवस्था अपनाए या पारंपरिक पोस्टपेड प्रणाली में बना रहे।

यह प्रावधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का भी प्रतीक है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति केवल इसलिए बिजली जैसी आवश्यक सेवा से वंचित न हो जाए कि वह किसी क्षण विशेष पर भुगतान करने में असमर्थ है।

लेकिन जब इसी व्यवस्था को नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से इस प्रकार मोड़ा जाता है कि विकल्प धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और अनिवार्यता व्यवहारिक रूप में स्थापित हो जाती है, तो यह न केवल कानून की भावना के विरुद्ध जाता है, बल्कि उपभोक्ता के अधिकारों के क्षरण की दिशा में एक चिंताजनक संकेत भी देता है।

वर्तमान परिदृश्य में जो सबसे अधिक विचारणीय है, वह यह है कि कागज पर किए गए संशोधन और जमीनी स्तर पर लागू की जा रही नीतियों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। एक ओर यह कहा जाता है कि अब स्मार्ट मीटर तो होंगे, परंतु उनका प्रीपेड होना अनिवार्य नहीं है; वहीं दूसरी ओर वास्तविकता यह है कि बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं के पुराने मीटर हटाकर उन्हें बिना स्पष्ट और सूचित सहमति के प्रीपेड मोड में परिवर्तित किया जा रहा है।

यह प्रक्रिया इतनी व्यवस्थित और व्यापक है कि आम उपभोक्ता के पास न तो पर्याप्त जानकारी होती है, न ही वह इस परिवर्तन का प्रतिरोध करने की स्थिति में होता है। धीरे-धीरे यह स्थिति एक “नए सामान्य” या कहें न्यू नार्मल के रूप में स्थापित कर दी जाती है, जहाँ विकल्प का अस्तित्व केवल कागजों में रह जाता है और व्यवहार में बाध्यता हावी हो जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ प्रशासनिक कार्यवाही और विधिक सिद्धांतों के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से उजागर होता है।

यदि इस पूरी प्रक्रिया का आर्थिक विश्लेषण किया जाए, तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल तकनीकी उन्नयन का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुदृढ़ वित्तीय संरचना भी कार्य कर रही है। स्मार्ट मीटर लगाने की परियोजनाएँ अत्यंत विशाल हैं, जिनमें हजारों करोड़ रुपये का निवेश शामिल है और जिनमें निजी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रीपेड मॉडल में कंपनियों को अग्रिम भुगतान प्राप्त हो जाता है, जिससे उनका वित्तीय जोखिम लगभग समाप्त हो जाता है, जबकि उपभोक्ता पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि वह निरंतर भुगतान सुनिश्चित करे, अन्यथा सेवा तुरंत बाधित हो सकती है। इस प्रकार, जोखिम का स्थानांतरण पूरी तरह उपभोक्ता की ओर कर दिया जाता है, जबकि लाभ का केंद्रीकरण कंपनियों के पास होता है।

यह संरचना स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठाती है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में सार्वजनिक हित में है, या यह निजी पूंजी के हितों को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए तैयार की गई है।

सामाजिक दृष्टिकोण से इस व्यवस्था के प्रभाव और भी गहरे हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्य करती है और जिसकी आय नियमित नहीं होती, वहाँ प्रीपेड व्यवस्था एक निरंतर असुरक्षा की भावना उत्पन्न करती है। पहले जहाँ उपभोक्ता को महीने के अंत में बिल चुकाने की सुविधा थी, अब उसे पहले ही भुगतान करना पड़ता है, और भुगतान में थोड़ी सी भी देरी या असमर्थता का परिणाम तत्काल बिजली कटौती के रूप में सामने आता है।

यह स्थिति विशेष रूप से गरीब और कमजोर वर्गों के लिए अत्यंत कठिन हो जाती है, क्योंकि उनके लिए बिजली केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन के संचालन का मूल आधार है। इस प्रकार, एक तकनीकी बदलाव सामाजिक असमानता को और गहरा करने का माध्यम बन सकता है, जहाँ संसाधनों तक पहुँच का निर्धारण भुगतान की तत्क्षण क्षमता के आधार पर होने लगता है।

इस समूचे परिदृश्य में राज्य की भूमिका भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में आती है। एक ओर राज्य स्वयं को कल्याणकारी और संवेदनशील बताता है, वहीं दूसरी ओर ऐसी नीतियों को लागू करता है जो उपभोक्ता की सुरक्षा और अधिकारों को कमजोर करती प्रतीत होती हैं। यदि कानून स्पष्ट रूप से विकल्प प्रदान करता है, और न्यायपालिका जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या कर चुकी है, तो फिर ऐसी व्यवस्था क्यों और कैसे लागू की जा रही है जिसमें उपभोक्ता की सहमति गौण हो जाती है।

यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक अक्षमता का परिणाम नहीं लगता, बल्कि यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं नीतिगत प्राथमिकताओं में परिवर्तन हुआ है, जहाँ जनहित और बाजारहित के बीच संतुलन बिगड़ता हुआ दिखाई देता है।

अंततः, यह पूरा प्रश्न हमें एक गहरे और निर्णायक निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि बिजली जैसी अनिवार्य सेवा को यदि पूर्णतः बाजार की शर्तों पर छोड़ दिया जाता है और उसे प्रीपेड अनुशासन में बाँधकर उपभोक्ता की तत्काल भुगतान क्षमता से जोड़ दिया जाता है, तो यह केवल एक नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि नागरिक के मौलिक अधिकारों की संरचना में हस्तक्षेप है।

जब जीवन के अधिकार की व्याख्या गरिमामय जीवन तक विस्तृत हो चुकी है, और जब कानून स्वयं विकल्प की गारंटी देता है, तब इस प्रकार की बाध्यकारी व्यवस्थाएँ न केवल विधिक रूप से संदिग्ध प्रतीत होती हैं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक दृष्टि से भी असंगत दिखती हैं।

इसलिए यह आवश्यक है कि इस पूरी व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन केवल तकनीकी या आर्थिक कसौटी पर नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ में किया जाए—क्योंकि यदि बुनियादी सेवाएँ भी अधिकार के बजाय “रीचार्ज आधारित उत्पाद” में परिवर्तित हो जाएँ, तो यह परिवर्तन केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का परिवर्तन होगा।

(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)

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